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Tuesday, January 12, 2021

भारत के सांस्कृतिक राजदूत : स्वामी विवेकानंद की जयंती 12 जनवरी पर विशेष

 

लेख : अरुण कुमार सिंह

12 जनवरी, 1863 को कोलकाता में जन्मे स्वामी विवेकानंद जी केवल 39 वर्ष की आयु में इस नश्वर शरीर को छोड़ गए। इस छोटी-सी आयु में उन्होंने इतना बड़ा कार्य कर दिया कि आज भी उनके कार्यों का उदाहरण दिया जाता है। स्वामी जी का दृढ़ विचार था कि हमें अपने अभावग्रस्त परिवारों की सेवा करनी चाहिए। हमारे देश में कितने बेसहारा हैं, कितने दिव्यांग हैं, वंचित हैं जिनको दो समय का भोजन नहीं मिलता है। सभी अभावग्रस्त परिवारों की सेवा हमारा धर्म है, उत्तरदायित्व है। इसको दया-दान न समझा जाए। हमें सनातन धर्म के सिद्धांतों को याद रखना चाहिए, जिसमें कहा गया है कि यदि दायां हाथ देता है तो बाएं हाथ को पता नहीं लगना चाहिए। स्वामी जी ने लोगों को बताया कि नर की सेवा ही नारायण की सेवा है। ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में रामधारी सिंह ‘दिनकर’ स्वामी जी की इस भावना को इन शब्दों में बताते हैं, ‘‘सच्ची ईशोपासना यह है कि हम अपने मानव-बन्धुओं की सेवा में अपने आपको लगा दें। जब पड़ोसी भूखा मरता हो, तब मंदिर में भोग चढ़ाना पुण्य नहीं, पाप है। जब मनुष्य दुर्बल और क्षीण हो, तब हवन में घृत जलाना अमानुषिक कर्म है।’’ केष्टा नामक संथाल को भोजन करा कर स्वामी जी ने कहा था, ‘‘तुम साक्षात् नारायण हो। आज मुझे संतोष है कि भगवान ने मेरे समक्ष भोजन किया।’’

स्वामी विवेकानंद जी ने लोगों को त्याग और सेवा के लिए प्रेरित ही नहीं किया, बल्कि रामकृष्ण मिशन के माध्यम से सेवा के अनेक प्रकल्प भी शुरू किए। स्वामी जी कहते थे, ‘‘दूसरों के लिए रत्ती भर काम करने से भीतर की शक्ति जाग उठती है। दूसरों के लिए रत्ती भर सोचने से धीरे-धीरे हृदय में सिंह का सा बल आ जाता है।’’  शास्त्रों में कहा भी गया है कि जो भगवान के दासों की सेवा करता है वही भगवान का सर्वश्रेष्ठ दास है। यह बात सर्वदा ध्यान में रखनी चाहिए  ‘‘निःस्वार्थपरता ही धर्म की कसौटी है। जिसमें जितनी ही अधिक निःस्वार्थपरता है वह उतना ही आध्यात्मिक है तथा उतना ही शिव के समीप।’’ स्वामी जी दान के महत्व को बताते हैं, ‘‘दान से बढ़कर और कोई धर्म नहीं है। सबसे अधम मनुष्य वह है जिसका हाथ सदा खिंचा रहता है और जो अपने लिए ही सब पदार्थों को लेने में लगा रहता है, और सबसे उत्तम पुरुष वह है जिसका हाथ हमेशा खुला रहता है। हाथ इसलिए बनाए गए हैं कि सदा देते रहो।’’

स्वामी जी अपने भाषणों में बार-बार कहते हैं, ‘‘कुछ भी न मांगो, बदले में कोई चाह न रखो। तुम्हें जो कुछ देना हो, दे दो। वह तुम्हारे पास वापस आ जाएगा, लेकिन आज ही उसका विचार मत करो। वह हजार गुना हो वापस आएगा पर तुम अपनी दृष्टि उधर मत रखो।’’
स्वामी जी कहते हैं, ‘‘क्या तुम अपने भाई-मनुष्य जाति को प्यार करते हो? ईश्वर को कहाँ ढूंढने चले हो- ये सब गरीब, दुखी, दुर्बल मनुष्य क्या ईश्वर नहीं हैं? इन्हीं की पूजा पहले क्यों नहीं करते? गंगा तट पर कुआं खोदने क्यों जाते हो? प्रेम की असाध्य साधिनी शक्ति पर विश्वास करो---’’
विवेकानन्द जी अपने भाषणों में शिक्षा पर विशेष बल देते थे। उनका कहना था, ‘‘जब तक करोड़ों भूखे और अशिक्षित रहेंगे तब तक मैं प्रत्येक आदमी को विश्वासघातक समझूँगा जो उनके खर्च पर शिक्षित हुआ है, परन्तु जो उन पर तनिक भी ध्यान नहीं देता।’’
स्वामी जी के शब्दों में ‘‘अपने भाइयों का नेतृत्व करने का नहीं, वरन् उनकी सेवा करने का प्रयत्न करो। नेता बनने की उस क्रूर उन्मत्तता ने बड़े-बड़े जहाजों को इस जीवन रूपी समुद्र में डुबो दिया है।’’

देश-विदेश का भ्रमण करते हुए स्वामी जी असंख्य लोगों के सम्पर्क में आए। इस दौरान वे मानव मन की कमजोरियों को भी भली प्रकार जान गए थे। स्वामी जी कहते हैं, ‘‘कमजोरी का इलाज कमजोरी का विचार नहीं पर शक्ति का विचार करना है। हमने अपने हाथ अपनी आँखों पर रख लिए हैं और चिल्लाते हैं कि सब ओर अंधेरा है।’’ 

स्वामी जी के इन गुणों को देखते हुए ही दिनकर जी ने लिखा है, ‘‘विवेकानन्द वह सेतु हैं, जिस पर प्राचीन और नवीन भारत परस्पर आलिंगन करते हैं। विवेकानन्द वह समुद्र हैं, जिसमें धर्म और राजनीति, राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता तथा उपनिषद् और विज्ञान, सब-के-सब समाहित होते हैं।’’ रवीन्द्रनाथ ने कहा है, ‘‘यदि कोई भारत को समझना चाहता है तो उसे विवेकानन्द को पढ़ना चाहिए।’’ महर्षि अरविन्द का वचन है, ‘‘पश्चिमी जगत् में विवेकानन्द को जो सफलता मिली, वही इस बात का प्रमाण है कि भारत केवल मृत्यु से बचने को नहीं जगा है, वरन् वह विश्व-विजय करके दम लेगा।’’ और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने लिखा है, ‘‘स्वामी विवेकानन्द का धर्म राष्ट्रीयता को उत्तेजना देने वाला धर्म था। नयी पीढ़ी के लोगों में उन्होंने भारत के प्रति भक्ति जगायी, उसके अतीत के प्रति गौरव एवं उसके भविष्य के प्रति आस्था उत्पन्न की। उनके उद्गारों से लोगों में आत्म-निर्भरता और स्वाभिमान के भाव जगे हैं। स्वामीजी ने सुस्पष्ट रूप से राजनीति का एक भी संदेश नहीं दिया, किन्तु जो भी उनके अथवा उनकी रचनाओं के सम्पर्क में आया, उसमें देशभक्ति और राजनैतिक मानसिकता आप-से-आप उत्पन्न हो गयी।’’

स्वामी जी ने 1893 में शिकागो के धर्म सम्मेलन में हिन्दुत्व का जैसा डंका बजाया था, वैसा उनसे पहले किसी ने भी नहीं बजाया था। इसलिए उन्हें भारत का सांस्कृतिक राजदूत भी कहा जाता है।

स्वामीजी न तो धर्म-युद्ध के प्रेमी थे, न उनकी यही सम्मति थी कि क्रोध के प्रत्येक उफान पर मनुष्य को तलवार लेकर दौड़ना ही चाहिए। किन्तु, हिंसा को, कदाचित् वे सभी स्थितियों में त्याज्य नहीं मानते थे। एक बार उनसे किसी भक्त ने पूछा ‘‘महाराज! कोई शक्तिशाली व्यक्ति यदि किसी दुर्बल का गला टीप रहा हो, तो हमें क्या करना चाहिए?’’ स्वामीजी ने तड़ाक से उत्तर दिया, क्यों? बदले में उस शक्तिशाली की गर्दन टीप दो। क्षमा भी कमजोर होने पर अक्षम्य है, असत्य और अधर्म है। युद्ध उससे उत्तम धर्म है। क्षमा तभी करनी चाहिए, जब तुम्हारी भुजा में विजय की शक्ति वर्तमान हो।’’

यदि ये सद्गुण हमारे पास हैं, तभी हम स्वामी जी की आकांक्षाओं की पूर्ति कर सकते हैं, यही स्वामी जी की इच्छा और आशीर्वाद है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार है


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