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Friday, June 12, 2020

व्यंग : रामगढ़ का सियासी ड्रामा, तारणहार की खोज में कंफ्यूज जनता


लेख : रितेश कश्यप 
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रामगढ़ के सियासी ड्रामे और अधिकारियों के मनमाने रवैए की वजह से पिछले 2 दिनों में छावनी परिषद के अंतर्गत रहने वाले लोग बीन पानी सब सून के गाने गाते रहे और गंदगी के अम्बार को देखकर कुढ़ते रहे। बेचारी जनता को तो ये पता भी नहीं चलता की रामगढ़ में उनके पीठ पीछे इतने कांड हो रहे हैं , मामला तो तब  प्रकाश में आया जब उनके नलों में से पानी आना बंद हो गए और सोशल मिडिया से पानी निकालने की सियासत और कवायद शुरू हो गयी। जनता का गुस्सा सातवें असमान पर था क्योंकि जनता गुस्सा करने के आलावा कुछ कर भी नहीं सकती थी। फेसबुक पोस्ट पर लाइक कमेंट का खेल भी शुरू हो चुका था। 

वैसे मिथिलांचल में एक कहावत है शायद आपने सुनी हो " बेटा बेटी केकरो,  घी ढारे मंगरो।" इसी से मिलता जुलता कुछ हद तक रामगढ में देखने को मिला ।

ये तो अटल सत्य है की जनता की परेशानी ही  सियासत की शुरुआत करती है और यही हुआ रामगढ़ शहर में भी । सब जगह पर जनता अपने अपने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों के पास पहुंचने लगे। जिस प्रकार रामायण में जामवंत ने हनुमान को उनकी ताकत का एहसास दिलाया उसी प्रकार शहर की जनता ने अपने अपने जनप्रतिनिधियों को उनके नेता होने का एहसास दिलाया।  सभी नेताओं ने अपनी प्यारी जनता के लिए हर संभव प्रयास किया किसी ने उपायुक्त के नाम आवेदन बनाया तो किसी ने अनशन पर बैठने का मन बनाया, वही किसी को लगा कि वह सोशल मीडिया से ही तूफान खड़ा कर देंगे । एकाएक रामगढ़ के सोशल मीडिया में बेचारी अबला जनता के हितैषीयो की भीड़ लगनी शुरू हो गई। बस फिर क्या था सबने अपना डंडा उठाया , डंडे में अपना झंडा डाला और निकल पड़े छावनी परिषद कार्यालय के सामने जहां उन्हें अपने नेता होने का परिचय देना था।  लगा दी भीड़ लगने लगे नारे। प्रशासन को भी लगा कि मामला गंभीर है अगर जल्द ही  संज्ञान नहीं लिया तो बातें बिगड़ सकती है, मामला अंतर्राष्ट्रीय ना हो जाये।  अंत में छावनी परिषद के अधिकारी पर प्रशासन और नेताओं का प्रेशर पड़ने के बाद लोगों की परेशानियों को दूर करना पड़ा, जल सुविधा और साफ-सफाई बहाल करनी पड़ी। नेताओं की नेतागिरी सफल हो गई।

सबसे बड़ी खोज : आखिर कौन वो तारणहार ? 

अब सबसे बड़ी परेशानी यह थी की आखिर जनता श्रेय किसको दे? आखिर कौन है वह तारणहार जिसने उन्हें इस विकट परिस्थिति से बाहर निकाला? मजे की बात तो तब हुई जब पूरे रामगढ़ के सोशल मीडिया प्रहरीयों में श्रेय लेने और देने की होड़ लग गई। रामगढ़ की जनता यह सोचकर कंफ्यूज थी कि आखिर वह कौन  है जिसके वजह से उनके घर में इतनी बड़ी खुशियां लौटी हैं। फेसबुक पर श्रेय लेने वालों की होड़ देख कर आम जनता ने भी मान लिया कि यह सब महज सियासी मामला भर ही था, दो दिनों से उनके घर पानी नहीं आया था घर के बाहर गंदगी का अम्बार लगा था। उन्होंने इस सियासी पचड़े में ना पड़कर सभी लोगों के पोस्ट को लाइक और कमेंट करते हुए अपने घर पर ध्यान देना ज्यादा उचित समझा।  इन सब में रामगढ़ की विधायक और बाकी कांग्रेस नेताओं ने अपने आप को तटस्थ रखना ही श्रेयस्कर समझा। वैसे उनके लिए किधर जाऊं किधर ना जाऊं वाली परिस्थिति आन खड़ी हुई थी क्योंकि जिधर भी जाते उधर नुकसान ही होना था इसलिए न्यूट्रल होना ज्यादा अच्छा रहा  । जनता का क्या है साल दो साल में भूल ही जाती है। वैसे भी जनता का काम चुनाव से मात्र एक या दो महीने तक के लिए ही तो होता है और उस दौरान जनता की सभी जरूरते पूरी कर ही दी जाती है।

खैर जो भी हो,  नेताओं की नेतागिरी तो चल ही गई, अखबारों में खबरें भी आ ही गयी। कुल मिलाकर जनता को लाभ ही हुआ, अब जनता के ही हाथ में है कि वह किसे दुख देने वाला माने और दुख हरने वाला। 

क्या था मामला ?

6 जून को झामुमो जिलाध्यक्ष विनोद किस्कू द्वारा छावनी परिषद के मुख्य अधिशासी अधिकारी सपन कुमार के खिलाफ जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करने को लेकर एससी एसटी थाने में आवेदन दे दिया गया । आवेदन देने के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा की तरफ से दबाव पड़ने के बाद पुलिस प्रशासन को सपन कुमार के खिलाफ 8 जून को केस रजिस्टर्ड करना पड़ा । राजनीती केवल नेता ही नहीं अधिकारी भी कर सकते हैं इसका उदाहरण छावनी परिषद् के मुख्य अधिकारी ने भी दे दिया बस अंतर इतना था की उनके समर्थक उन्ही के कार्यालय में काम करने वाले कर्मचारी थे । मुख्य अधिशासी अधिकारी सपन कुमार के द्वारा भी झामुमो नेता विनोद किस्कू के खिलाफ मोर्चा खोल दिया गया। सपन कुमार ने विनोद किस्कू के खिलाफ सरकारी काम में बाधा पहुंचाने को लेकर थाने में आवेदन दे दिया , वहीं दूसरी ओर सपन कुमार के कार्यालय में कार्यरत कर्मचारियों द्वारा भी उनका साथ देते हुए धरना पर बैठ गये जिससे पूरे रामगढ़ शहर में पानी और साफ-सफाई की व्यवस्था ध्वस्त हो गई। युद्ध का बिगुल बजा दिया गया, अब जब दोनों तरफ से युद्ध जारी था तो इन दोनों के युद्ध में हर्जाना भुगतना पड़ता ही है उसमे बलि का बकरा के लिए जनता की ही बलि दे दी गयी।

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