संस्कृत भाषा और नैतिक मूल्यों पर एक दिवसीय शिविर का हुआ आयोजन - Rashtra Samarpan News and Views Portal

Breaking News

Home Top Ad


 Advertise With Us

Post Top Ad


Subscribe Us

Monday, February 4, 2019

संस्कृत भाषा और नैतिक मूल्यों पर एक दिवसीय शिविर का हुआ आयोजन


नैतिकता का रास्ता संस्कृत से होकर ही जाता है : दिनेश कामत

संस्कृत पूर्णत: वैज्ञानिक भाषा है। इसकी वर्णमाला सिर्फ भाषा का उच्चारण मात्र नहीं है बल्कि इसका अपना उच्चारण शास्त्र है। जो व्यक्ति संस्कृत का उच्चारण कर सकता है, वह किसी भी भाषा का सही और स्पष्ट उच्चारण कर सकता है उक्त बातें संस्कृत भारती के अखिल भारतीय संगठन मंत्री दिनेश कामत ने चाणक्य आईएएस एकेडमी के विद्यार्थियों को मार्गदर्शन देते हुए कहा । दिनेश कामत गणतन्त्र दिवस के दौरान विशेष आमंत्रण पर बच्चों को मार्गदर्शन देने दिल्ली से आए थे । उन्होने नैतिकता और भारतीय संस्कृति का पाठ पढ़ाते हुए कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा और विचारधारा संस्कृत में ही निहित है। विविधता में एकता का विचार भारत में ही है और इसका प्रकटीकरण संस्कृत में है। वर्तमान समाज में व्याप्त विरूपता का सबसे बड़ा कारण भारतीय संस्कृति को छोड़ना है।

विभिन्न सदियों पुरानी ज्ञान परंपरा

कामत ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा सदियों पुरानी है। एक समय वह भी था जब शिक्षा के शीर्ष 10 विश्वविद्यालय भारत में ही हुआ करते थे। नालंदा, तक्षशिला कुंडिनपुर, श्रीवल्लभी आदि शिक्षा के बड़े केन्द्र हुआ करते थे। श्रीवल्लभी में महिला शिक्षा का केन्द्र था, जबकि कुंडिनपुर शारीरिक शिक्षा का। दूर देशों के लोग भी भारत में संस्कृत सीखने के लिए आते थे। राज्यों के बीच सांस्कृतिक एकता संस्कृत के कारण है।

अन्य भाषाओं पर संस्कृत का प्रभाव

जर्मन, अंग्रेजी, स्पेनिश आदि भाषाओं पर संस्कृत का प्रभाव है। जर्मन और स्लाविक भाषा में तो द्विवचन पाया जाता है, जो कि संस्कृत में ही होता है। जर्मन एयरलाइंस लुफ्तहंसा संस्कृत से ही प्रेरित है। इंडोनेशिया की भाषा का तो नाम ही बहासा है।

संस्कृत में ज्ञान का भंडार

उन्होंने कहा कि संस्कृत में ज्ञान का भंडार है। 50 लाख पांडुलिपियां संस्कृत में मौजूद हैं, जबकि 5 लाख पांडुलिपियां विदेशों में हैं। ज्ञान की सभी शाखाएं संस्कृत ग्रंथों में उपलब्ध हैं। उत्कृष्ट ज्ञान के चलते ही हजारों साल पहले पंचांग और ग्रहण के बारे में भारतीयों ने जानकारी जुटा ली थी। उन्होंने कहा कि षड्यंकत्र के तहत संस्कृत को क्लिष्ट भाषा के रूप में प्रचारित किया गया। इसी के चलते पहले व्याकरण सिखाया जाने लगा, जबकि संस्कृत को संस्कृत में ही सिखाया जाना चाहिए। कोई भी भाषा जब बोली जाएगी तब ही लोग उसे समझ पाएंगे। कोंकणी भाषा को बोलने वालों की संख्या 50 लाख के लगभग है, जबकि उसकी अपनी कोई लिपि नहीं है।

अंबेडकर ने कहा था : दिनेश

कामत ने एक उदाहरण देते हुए कहा कि सितंबर 1949 में संविधान सभा में डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि संस्कृत ही भारत की आधिकारिक भाषा होनी चाहिए, लेकिन बाद में हिन्दी को अपनाया गया। हिन्दी के लिए डॉ. अंबेडकर ने संस्कृत निष्ठ हिन्दी की वकालत की थी। इसके लिए उस समय पारिभाषिक शब्दावली भी तैयार करवाई गई थी। उन्होंने कहा कि कक्षा 6 से 12वीं तक संस्कृत अनिवार्य होना चाहिए। सभी स्कूलों मंर तृतीय भाषा के रूप में संस्कृत पढ़ाई जानी चाहिए। संस्कृत पढ़ने से बच्चों में न सिर्फ भावनात्मक विकास होता है बल्कि उनकी स्मरण शक्ति भी बढ़ती है।

विदेशों में संस्कृत

कामत ने बताया कि अमेरिका, जर्मनी, कनाडा समेत विश्व के 40 देशों में संस्कृत पढ़ाई जा रही है। भारत के 120 विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई जार ही है, जबकि देश में 16 संस्कृत विश्वविद्यालय संचालित हो रहे हैं। 5000 के लगभग गुरुकुल संचालित हो रहे हैं।

संस्कृत से रोजगार

दिनेश कामत ने बच्चों को ज्ञान का पाठ पढ़ाते हुए कहा कि हमारे यहां रोजगार तो गौण है। दरअसल, शिक्षा मनुष्य के मनुष्य बनाने के लिए होनी चाहिए। सा विद्या या विमुक्तये अर्थात शिक्षा का लक्ष्य शरीरिक, बौद्धिक और आध्यामिक विकास होना चाहिए, लेकिन अंग्रेजों ने इसे बदलकर सा विद्या या नियुक्तये कर दिया। लेकिन, यह बात भी सही है कि संस्कृत जानने वाले बेरोजगार नहीं है। अंग्रेजी और संस्कृत जानने वालों की तो विदेशों में बहुत जरूरत है। उन्हें आसानी से नियुक्ति मिल जाती है।

सामाजिक समरसता

संस्कृत भारती के संगठन मंत्री ने कहा कि सामाजिक समरसता, छुआछूत निवारण और राष्ट्रीय भावना जागृत करने के लिए संस्कृत आवश्यक है। आज विद्यालयों में नैतिक शिक्षा नहीं दी जाती, घरों में भी संस्कार नहीं मिल रहे हैं। मोबाइल और टीवी की वजह से भी अनैतिकता बढ़ी है। उन्होंने कहा कि शिक्षा में नैतिक शिक्षा और मूल्य आधारिक शिक्षा का समावेश अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। नैतिकता आज की आवश्यकता है और इसके लिए संस्कृत के अलावा कोई और मार्ग नहीं है। सक्सेस गुरु एके मिश्रा भी समाजिक कार्यों के माध्यम से लोगों को भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों के तहत लोगों को जागरूक करने का प्रयास कर रहे हैं हम सब उनके साथ हैं ।

संस्कृत भारती के प्रयास सराहनीय : सक्सेस गुरु एके मिश्रा

शिविर के माध्यम से दिल्ली से दिये अपने संदेश में चाणक्य आईएएस एकेडमी एवं एके मिश्रा फ़ाउंडेशन के संस्थापक चेयरमैन सक्सेस गुरु एके मिश्रा ने कहा कि संस्कृत भारती संस्कृत सिखाने के लिए 1 लाख 40 हजार शिविरों का आयोजन कर चुकी हैं। इन शिविरों में करीब 94 लाख लोग भागीदारी कर चुके हैं। इनमें अशिक्षित लोग भी शामिल थे। इसके अतिरिक्त पत्राचार द्वारा भी 11 भाषाओं में संस्कृत सिखाई जा रही है। इनमें अंग्रेजी और हिन्दी के अलावा मराठी, गुजराती, बंगाली, असमी आदि माध्यम से संस्कृत सीखी जा सकती है। पूरे राष्ट्र में संस्कृत भारती द्वारा किया जा रहा कार्य सराहनीय है ।
उन्होंने कहा दिनेश कामत जी भी संस्कृत सुनते सुनते ही सीखी। साथ उनके मार्गदर्शन में संस्कृत भारती संभाषण संदेश नामक एक पत्रिका का भी प्रकाशत करती है। नरेन्द्र कोहली, जेम्स हेडली चेज के उपन्यास संस्कृत में अनूदित हो चुके हैं। कथा, प्रबंध, भगतसिंह की कथा, अंबेडकर की कथा आदि सामग्री भी संस्कृत में उपलब्ध है। इन सब प्रयासों से व्यक्ति में ग्रंथ पढ़ने की मानसिकता बनती है जो कालांतर में ग्रंथ पढ़ने तक जाती है। दिनेश कामत जी का लक्ष्य है कि संस्कृत सभी लोग सीखें। यह जाति, वर्ग और भौगोलिक सीमाओं में सिमटकर न रहे।

शिविर में दिनेश कामत के साथ आए अतिथि श्रीश देवपुजारी, चाणक्य आईएएस एकेडमी के उपाध्यक्ष विनय मिश्रा, महाप्रबंधक रीमा मिश्रा सहित अन्य अतिथियों ने भी संस्कृत भाषा और भारतीय संस्कृति से जुड़े ज्ञान की बात वियार्थियों के समक्ष संबोधित किया । शिविर में चाणक्य आईएएस एकेडमी के तरफ से अतिथियों को सम्मानित भी किया गया ।

शिविर में उपस्थित सैकड़ों विद्यार्थियों ने कहा कि आज जो भाषा और संस्कृति पर जो मार्गदर्शन मिला वह हमारे अंतरात्मा को जगा दिया । इस तरह के शिविर से हम विद्यार्थियों को काफी कुछ सिखने को मिलता है।

No comments:

Post a Comment

Like Us

Ads

Post Bottom Ad


 Advertise With Us